लोकगायक किशन महिपाल और सनी दयाल ने उत्तराखंड जनजातीय महोत्सव के दूसरे दिन दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध

देहरादून । उत्तराखंड जनजातीय शोध संस्थान (टीआरआई) द्वारा आयोजित उत्तराखंड राज्य जनजातीय महोत्सव के दूसरे दिन उत्तराखंड की समृद्ध जनजातीय विरासत की रंगारंग प्रस्तुति देखने को मिली। प्रसिद्ध लोकगायक किशन महिपाल और सनी दयाल की संगीतमय प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री के अपर सचिव एस. एस. टोलिया रहे।
परेड ग्राउंड, देहरादून में आयोजित इस कार्यक्रम में भारी संख्या में लोकसंगीत प्रेमी पहुंचे और लोकधुनों पर झूमते नजर आए।
मुख्य अतिथि एस. एस. टोलिया ने महोत्सव और टीआरआई की पहल की सराहना करते हुए कहा, उत्तराखंड राज्य जनजातीय महोत्सव 2025 हमारी जनजातीय परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक सराहनीय प्रयास है। इस महोत्सव के माध्यम से उत्तराखंड की गहरी सांस्कृतिक जड़ें प्रदर्शित की जा रही हैं, जो हमारे समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत बनाती हैं।”
लोकसंगीत प्रेमियों के लिए यह एक अविस्मरणीय संगीतमय संध्या रही, जहां लोकगायक किशन महिपाल ने अपने लोकप्रिय गीतों से समां बांध दिया। उत्तराखंडी लोकसंगीत को आधुनिक धुनों के साथ प्रस्तुत करने वाले महिपाल ने ‘घुघूति ना बसां’, ‘लागी बदूली’ और ‘भानु मेरी’ जैसे प्रसिद्ध गीतों से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। उनकी ऊर्जा और दमदार आवाज ने संगीतमय माहौल में चार चांद लगा दिए।
उनके साथ मंच साझा करते हुए सनी दयाल ने भी गढ़वाली और कुमाऊंनी लोकगीतों की शानदार प्रस्तुति दी। ‘ओ बाबिये’ और ‘बिद्रु’ जैसे लोकगीतों पर दर्शक झूम उठे और उत्तराखंड की पारंपरिक संगीत परंपरा का भरपूर आनंद लिया। तीन दिवसीय उत्तराखंड जनजातीय महोत्सव कल समाप्त होगा। इस दौरान सैकड़ों लोग उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने और समझने के लिए पहुंचे। महोत्सव में लगे मेले ने भी लोगों का खास ध्यान खींचा, जहां जूट के बैग, सजावटी वस्तुएं, जैविक उत्पाद और उत्तराखंडी पारंपरिक व्यंजन विशेष आकर्षण का केंद्र बने।
टीआरआई उत्तराखंड के समन्वयक राजीव कुमार सोलंकी ने महोत्सव को लेकर अपने विचार साझा करते हुए कहा, उत्तराखंड जनजातीय महोत्सव हमारे जनजातीय कलाकारों, शिल्पकारों और सांस्कृतिक प्रेमियों के लिए अपनी समृद्ध परंपराओं को प्रदर्शित करने का एक उत्कृष्ट मंच है। लोगों की जबरदस्त भागीदारी यह दर्शाती है कि हमारी जनजातीय विरासत को सहेजने और प्रचारित करने की कितनी आवश्यकता है। दिनभर के कार्यक्रम में उत्तराखंड की विभिन्न जनजातियों (भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू) के साथ-साथ देशभर के अन्य राज्यों के सांस्कृतिक दलों ने भी शानदार प्रस्तुतियां दीं। इस अवसर पर टीआरआई उत्तराखंड के अपर निदेशक योगेंद्र रावत सहित कई गणमान्य व्यक्ति और सांस्कृतिक प्रेमी उपस्थित रहे।

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